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व्यवसाय एवं कानूनी

पॉलीग्राफ टेस्ट

कार्यस्थल चोरी, विवाद और स्क्रीनिंग के लिए स्वैच्छिक लाई डिटेक्टर टेस्ट।

पॉलीग्राफ टेस्ट

पॉलीग्राफ सावधानी से तैयार सवालों के जवाब देते समय व्यक्ति की सांस, नब्ज़ और त्वचा की प्रतिक्रिया रिकॉर्ड करता है। यह एक व्यवस्थित इंटरव्यू तरीका है जो जांच का दायरा छोटा करने या निजी शक दूर करने में मदद करता है, और केवल जांच कराने वाले व्यक्ति की पूरी लिखित सहमति से होता है।

हम क्या करते हैं

  • प्रक्रिया समझाने के लिए टेस्ट से पहले बातचीत
  • आपके साथ पहले से तय सवाल
  • चोरी, धोखाधड़ी और कैश की कमी के लिए टेस्ट
  • पारिवारिक और कारोबारी विवादों में टेस्ट
  • चार्ट विश्लेषण और लिखित रिपोर्ट

लोग हमारे पास कब आते हैं

  • कैश या माल गायब हुआ और कई कर्मचारियों की पहुंच थी
  • पारिवारिक विवाद में व्यवस्थित तरीका चाहिए
  • कंपनी ईमानदारी की स्क्रीनिंग चाहती है
  • कोई अपनी सच्चाई स्वेच्छा से साबित करना चाहता है

आपको क्या मिलता है

पूछे गए सवालों, रिकॉर्ड हुए चार्ट और हर सवाल पर परीक्षक की राय की लिखित रिपोर्ट।

सवाल

क्या भारत में पॉलीग्राफ अदालत में मान्य है?

सुप्रीम कोर्ट के 2010 के सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य फ़ैसले के अनुसार किसी को टेस्ट के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता और केवल उसका नतीजा सबूत के रूप में मान्य नहीं है। स्वैच्छिक टेस्ट फिर भी जांच को दिशा दे सकता है। हम हर टेस्ट से पहले यह समझाते हैं।

क्या बिना सहमति टेस्ट हो सकता है?

नहीं। व्यक्ति को लिखित सहमति देनी होती है और वह कभी भी रुक सकता है।

क्या मेरा मामला गोपनीय रहेगा?

हाँ। आपकी पहचान, आपकी बताई बातें और हमारे निष्कर्ष केवल आपसे, या जिसे आप लिखित में बताएं, उसी से साझा होते हैं।

कुछ बातें अंधेरे में नहीं रहनी चाहिए।

पहली बातचीत गोपनीय है और इसमें कोई बाध्यता नहीं।

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